भक्ति की आवश्यकता क्यों
गरीब, यह हरहट का कुंआ लोई। यो गल बंध्या है सब कोई।। कीड़ी-कुंजर (चींटी-हाथी) और अवतारा। हरहट डोर बंधे कई बारा।। भावार्थ :- पुराने समय में सिंचाई के लिए एक कुंआ खोदा जाता था। उससे पानी निकालने के लिए एक पहिये जैसा बड़ा चक्र लोहे का बनाया जाता था जो लकड़ी के सहारे कुऐं के ऊपर मध्य में रखा जाता था। उसके ऊपर लंबी चैन की तरह बाल्टियाँ लगाई जाती थी। कुंए से कुछ दूरी पर कोल्हू जैसा यंत्र लगाकर बैलों के द्वारा चलाया जाता था। बाल्टियाँ जो चैन (पटे) पर लगी होती थी, वे बैल द्वारा घुमाने से खाली नीचे कुंए में चली जाती थी,पानी से भरकर ऊपर आती थी। ऊपर एक नाले में खाली होकर फिर नीचे कुंए में भरने के लिए जाती थी। यह क्रम सारा दिन और महीनों चलता रहता था। इसका उदाहरण देकर संत गरीबदास जी ने समझाया है कि जब तक तत्वदर्शी संत ( सतगुरु = सच्चा गुरू ) नहीं मिलता, तब तक जीव स्वर्ग-नरक, पृथ्वी पर ऐसे चक्र काटता रहता है जैसे रहट की बाल्टियाँ नीचे कुंए से जल भरकर लाती हैं। ऊपर नाले में खाली होकर पुनः कुंए में चली जाती हैं। उसी प्रकार जीव पृथ्वी पर पाप-पुण्य से भरकर ऊपर स्वर्ग-नरक में अपने कर्म...